Sunday, December 6, 2009

कल

पीछे मुड़-मुड़  कर देखना चाहता हूँ
पर नहीं देखता 
देखता हूँ तो आगे 
नया कुछ जो नहीं देखा अब तक 
आगे ही तो हैं 
हाँ ,आगे ही तो हैं 
जिसे पा लेने को चलते हैं सब 
नहीं हैं जो मरीचिका 
तय हैं 
आगे हैं 
समय की अनंत नदी 
जिसमे बहता जल 
कल कल 
होगा  अपूर्व  अनुपम 
हाँ ,आने वाला कल 

Saturday, November 28, 2009

उस तरह

वह कोई सपना नहीं 
छू सकता हूँ मैं उसे 
आँसू की तरह 
आँख से बहकर 
हौले से लुढकने तक
वह सिर्फ मेरा हैं 
फिर मिट्टी में
कण की शक्ल अख्तियार करते हुए 
जान लेता हूँ मैं
जीवन के उच्छ्वास 
मैं भय से सिहर जाता हूँ
तब नहीं आता पास तुम्हारे

तुम्हे भय से नजदीकियां पसंद नहीं 
मैं उससे मुक्त हो
चाहता आना पास तुम्हारे 
प्रेम तुम्हारा पाने को

Saturday, November 21, 2009

सभ्यता

बहुत छोटी सी कहानी हैं 
मनुष्य के विकास की
इतनी  छोटी कि
फिर फिर आ जाता हैं 
वहीं प्रस्थान बिंदु पर 
मनुष्य 
जहां से शुरू हुई थी 
उसकी यात्रा 

Friday, November 20, 2009

ढाबे में लड़का


ढाबे में 
मेज बजा कर 
मैंने लड़के से पानी को कहा 
उसने लापरवाही से मेरी तरफ देखा 
और पानी भरा गिलास मेज पर पटका 
मेरा ध्यान पानी में डूबी उसकी उँगलियों पर था 
नन्ही पतली सी उन उँगलियों में तो 
रंगीन पेंसिल होनी चाहिए 
मुझे बेतहाशा अपना बेटा याद आया 
फिर मुझसे वहां रुका ना गया 


पीछे से चीख सुनाई दी 
ग्राहक  ख़राब कर दिया ना 
लड़के पर हाथ उठाता मालिक चिल्ला रहा था 
मैं  शर्मिंदा था 
मेरी भावुकता उस बच्चे के लिए महँगी पड़ी 

Saturday, November 14, 2009

फेहरिस्त

मेरे दुश्मनों की फेहरिस्त
बहुत लम्बी हैं 
लम्बी इतनी कि
उड़ जाये नींद रातों की
जबकि  चाहता हूँ मैं सोना
लम्बी तान कर
कबीर की तरह 
जिसके  दुश्मनों की फेहरिस्त
और भी लम्बी हैं 

Tuesday, November 10, 2009

बाद में


वे चुप थे 
जब हो रही थी हत्या 
उनके सामने 
हाँ ,उन्हें आ रही थी अब शर्म 
कि हत्या हो रही थी और वे चुप थे 
 किया नहीं प्रतिरोध 
जरा  सा भी नहीं ,
उन्हें सचमुच शर्म आ रहीं थी 
पर क्या फर्क पड़ता 
अगर उन्हें शर्म नहीं भी आ रही हो अब 
हत्या हो चुकी थी 

Saturday, November 7, 2009

फूल

सवेरे उठा तो फूल खिला था 
मैं उससे हौले से बतियाया 
उसकी  बातों से और 
भीनी भीनी गंध से भी 
झलकता था साफ-साफ 
कि वह बहुत खुश हैं 
हालाँकि गमले में पानी डालना 
दो दिन से भूल गया था मैं 
और एक कांटा ठीक सिर के नीचे
उसके  भाले सा तना था    
हाँ ,वह फूल 
इतना खुश और निश्चिंत 
लग रहा था 
भला कोई कैसे सोच सकता था 
शाम होते होते वह मुरझा जायेगा 
और कल तक अपनी झाडी से 
जायेगा झड़


महक  उसकी तो बसी रहेगी 
सदा मन में

indic हिंदी rajbhasha parashar