पीछे मुड़-मुड़ कर देखना चाहता हूँ
पर नहीं देखता
देखता हूँ तो आगे
नया कुछ जो नहीं देखा अब तक
आगे ही तो हैं
हाँ ,आगे ही तो हैं
जिसे पा लेने को चलते हैं सब
नहीं हैं जो मरीचिका
तय हैं
आगे हैं
समय की अनंत नदी
जिसमे बहता जल
कल कल
होगा अपूर्व अनुपम
हाँ ,आने वाला कल
Sunday, December 6, 2009
Saturday, November 28, 2009
उस तरह
वह कोई सपना नहीं
छू सकता हूँ मैं उसे
आँसू की तरह
आँख से बहकर
हौले से लुढकने तक
वह सिर्फ मेरा हैं
फिर मिट्टी में
कण की शक्ल अख्तियार करते हुए
जान लेता हूँ मैं
जीवन के उच्छ्वास
मैं भय से सिहर जाता हूँ
तब नहीं आता पास तुम्हारे
तुम्हे भय से नजदीकियां पसंद नहीं
मैं उससे मुक्त हो
चाहता आना पास तुम्हारे
प्रेम तुम्हारा पाने को
छू सकता हूँ मैं उसे
आँसू की तरह
आँख से बहकर
हौले से लुढकने तक
वह सिर्फ मेरा हैं
फिर मिट्टी में
कण की शक्ल अख्तियार करते हुए
जान लेता हूँ मैं
जीवन के उच्छ्वास
मैं भय से सिहर जाता हूँ
तब नहीं आता पास तुम्हारे
तुम्हे भय से नजदीकियां पसंद नहीं
मैं उससे मुक्त हो
चाहता आना पास तुम्हारे
प्रेम तुम्हारा पाने को
Saturday, November 21, 2009
सभ्यता
बहुत छोटी सी कहानी हैं
मनुष्य के विकास की
इतनी छोटी कि
फिर फिर आ जाता हैं
वहीं प्रस्थान बिंदु पर
मनुष्य
जहां से शुरू हुई थी
उसकी यात्रा
Friday, November 20, 2009
ढाबे में लड़का
ढाबे में
मेज बजा कर
मैंने लड़के से पानी को कहा
उसने लापरवाही से मेरी तरफ देखा
और पानी भरा गिलास मेज पर पटका
मेरा ध्यान पानी में डूबी उसकी उँगलियों पर था
नन्ही पतली सी उन उँगलियों में तो
रंगीन पेंसिल होनी चाहिए
मुझे बेतहाशा अपना बेटा याद आया
फिर मुझसे वहां रुका ना गया
पीछे से चीख सुनाई दी
ग्राहक ख़राब कर दिया ना
लड़के पर हाथ उठाता मालिक चिल्ला रहा था
मैं शर्मिंदा था
मेरी भावुकता उस बच्चे के लिए महँगी पड़ी
Saturday, November 14, 2009
फेहरिस्त
मेरे दुश्मनों की फेहरिस्त
बहुत लम्बी हैं
लम्बी इतनी कि
उड़ जाये नींद रातों की
जबकि चाहता हूँ मैं सोना
लम्बी तान कर
कबीर की तरह
जिसके दुश्मनों की फेहरिस्त
और भी लम्बी हैं
बहुत लम्बी हैं
लम्बी इतनी कि
उड़ जाये नींद रातों की
जबकि चाहता हूँ मैं सोना
लम्बी तान कर
कबीर की तरह
जिसके दुश्मनों की फेहरिस्त
और भी लम्बी हैं
Tuesday, November 10, 2009
बाद में
वे चुप थे
जब हो रही थी हत्या
उनके सामने
हाँ ,उन्हें आ रही थी अब शर्म
कि हत्या हो रही थी और वे चुप थे
किया नहीं प्रतिरोध
जरा सा भी नहीं ,
उन्हें सचमुच शर्म आ रहीं थी
पर क्या फर्क पड़ता
अगर उन्हें शर्म नहीं भी आ रही हो अब
हत्या हो चुकी थी
Saturday, November 7, 2009
फूल
सवेरे उठा तो फूल खिला था
मैं उससे हौले से बतियाया
उसकी बातों से और
भीनी भीनी गंध से भी
झलकता था साफ-साफ
कि वह बहुत खुश हैं
हालाँकि गमले में पानी डालना
दो दिन से भूल गया था मैं
और एक कांटा ठीक सिर के नीचे
उसके भाले सा तना था
हाँ ,वह फूल
इतना खुश और निश्चिंत
लग रहा था
भला कोई कैसे सोच सकता था
शाम होते होते वह मुरझा जायेगा
और कल तक अपनी झाडी से
जायेगा झड़
महक उसकी तो बसी रहेगी
सदा मन में
मैं उससे हौले से बतियाया
उसकी बातों से और
भीनी भीनी गंध से भी
झलकता था साफ-साफ
कि वह बहुत खुश हैं
हालाँकि गमले में पानी डालना
दो दिन से भूल गया था मैं
और एक कांटा ठीक सिर के नीचे
उसके भाले सा तना था
हाँ ,वह फूल
इतना खुश और निश्चिंत
लग रहा था
भला कोई कैसे सोच सकता था
शाम होते होते वह मुरझा जायेगा
और कल तक अपनी झाडी से
जायेगा झड़
महक उसकी तो बसी रहेगी
सदा मन में
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